त्याग
त्याग
उससे कोई दो चार ही मुलाकातें हुई थी l पहली से आखिरी मुलाकात में भी वो अनमेरिड ही थी l मैंने उसे कई बार शादी के प्रस्ताव रखे कि अच्छा सा लड़का देख कर शादी कर लीजिए l क्योंकि एक बार किसी कॉन्फ्रेंस में गीता ने मुझे उस पर व्यंग्य करते हुए कहा था-वो अनमेरिड है ना l" शायद! मैंने जानबूझ कर यही कहा था l
फिर एक बार गीता से फिर मुलाकात में वही प्रश्न - "अरे! तेरी मेम कैसी है हरि?" "एक दम मस्त" मेरा जवाब उसके चेहरे पर पानी फ़ेर देता वहीं मुझे भी कई-कई दिन परेशान भी करता l हर लड़की की अपनी मर्यादा होती है, अगर वो लड़का होती तो एक - एक लड़की को चार- चार बार देखकर रिजेक्ट करती फिर कोई कहीं फाइनल करके शादी करती, पर स्त्रीत्व का धन सदैव सीमित व इच्छाओं का दमन कर जीने वाला ही होता है l
गीता जब भी मुझसे मिलती न जाने क्यूँ उसी के बारे में यही एक ही सवाल पूछा करती थी l मैं बड़ा हैरान था, जिसे मैं ईश्वर के तुल्य समझा, उसके बारे में मेरे कानों ने कटुता भरे शब्द सुनने मिलते l ओर तो ओर दूसरे साथी भी उनके नाम की चुटकियां भरते, इसी प्रतिकार के कारण मैं अपनापन दिखाया करता और आखिर रटीरटायी बात कह ही देता - देवी, शादी कर लो l वो हर बार मेरी बातों को इग्नोर कर दिया करती थी l शायद उसे किसी का इंतज़ार था l
एक दिन मेरे यही कहने पर घर जाकर फोन पर मुझसे बात करते हुए बहुत रोई थी, यहाँ तक कह दिया कि "जी करता मैं अभी मर जाऊँ l" उस दिन मैं भी बहुत रोया था l मेरी माँ कहती थी, कि मर्द रोते नहीं l वो बात झूठी हो गयी, क्योंकि मैं मेरे आँसू स्वत ही निकल रहे थे l
समय कब बीत जाता है, दूरियाँ बनती गयी एक ओर मैं अपनी पारिवारिक दुनिया में दो पुत्रों का पिता बना l मेरी पत्नी प्रियंका से मुझे बहुत प्यार मिला है, पर उन आंसुओ को मैं भूला नहीं सका l आज बीसों वर्षों बाद भी यदा-कदा किसी समाचार या टेलीविजन के कुछ दृश्यों में उसका साया मेरे सामने आकर अंतर्मन को झकझोर कर रख देता l कुछ भावुक दृश्यों को देखकर मेरी आँखों में आँसू आ जाते तो प्रियंका कहती - "बड़े भावुक हो l" उधर मेरे बेटे भी व्यंग्य करते - "क्या डैडी आप टीचर होकर भीl" न जाने क्यों आजकल उसके ही ख्याल मेरे दिल - दिमाग में घूमते लगे l ये आँसू उन्हीं के थे, ये कौन जाने ? कौन सुने ? क्योंकि मेरी उस निश्चल प्रेम की अनन्या देवी को सुनने के लिए वृषभानुजा के दोनों स्वरुपों की शक्ति एक ओर तो ब्रज की ग्वालिन वाला कोमल हृदय और दूसरी ओर उसी कोमलता से परे वज्र का पक्का सहनशील व प्रेम का स्वार्थहीन त्याग वाला दिल चाहिए, वो शायद ही किसी पत्नी के पास हो, पर मेरी प्रियंका पास नहीं है l
मैं देवी को कभी भुला नहीं l आज लगभग पच्चीस वर्ष बाद मुझे सब्जी बाजार में दूर से देवी की झलक देखने को मिली l मैं तुरन्त पहचान गया l मैं उसको रोकना चाहता था, पर नहीं, नवविवाहित जवान बेटा साथ था l
आज फिर पच्चीसों सालों की पुरानी यादें ताजा हो गयी l वही रटीरटायी बात खयालों में उतर गयी - "देवी, अब तो शादी कर लीजिए l"
मैं उसकी तलाश करने लगा आज महीनेभर इन्हीं गलियों में भटकने के बाद मुझे श्री राधाकृष्ण मंदिर से निकलती दिखाई दी l मैंने भागमभाग करके फूलती साँसों को लिए मंदिर पहुंचा l देवी, रुको l मेरी आवाज़ दबी सी थी, साँस फूल रही थी, बोला भी नहीं जा रहा था, पर उनके कानों में मेरी आवाज़ पहुंची l मैं साँसेभर थोड़ा रुका l
वो रुकी, मेरी तरफ देखा पर उसके कदम मेरी तरफ न बढ़े, मैं ही चलकर उसके सामने आया l झूठी मुस्कान बिखरते हुए उसी प्यार वाले स्टाइल में होठों पर तर्जनी उँगली रखते हुए बोली - "हरि तुम, देखो पहचान लिया ना मैंने ! उसकी आवाज़ में आज भी ग़मगीन उदासी, आँखों को न मिला पाने की झूठी हामी और धीरे - धीरे से बंद करती-खोलती पलकों के पीछे छुपा दर्द साफ दिखायी दे रहा था l मैंने सिर हिलाते हुए कहा - हाँ l आजकल कहाँ रहती हो? कितने बच्चे हैं?
मेरा प्रश्न करते ही मुड़ गयी और चल पड़ी, पर मेरे कदम उसके कदमों का साथ देने के लिए आगे न बढ़े और उसने चलते -चलते बिना देखे अपनी पीठ से ही जबाव देते हुए कहा -"शादी नहीं की, तूने पूछा नहीं, गैरों से की नहीं l" इतना कहते ही वो दूसरी गली में मुड़ गयी l मेरी आँखों ने एक निश्चल प्यार को खोने का भयानक दृश्य, एक स्त्रीत्व का एकांत भरा दर्द, उसका संघर्ष, उसकी सहनशीलता, उसके अरमानों का जड़त्व चित्रण, रातभर घुट - घुटकर रोने वाली आँखे देखी; उस महान बलिदानी देवी के आगे मैं नतमस्तक खड़ा, भरी आँखे लिए निरुत्तर था l
© भार्गव हिन्दी जुड़वाँ
हेतराम हरिराम हिन्दी जुड़वाँ
9829960782 - 9829960882
हेतराम भार्गव
शिक्षा - MA हिन्दी, B. ED., NET 8 बार
हरिराम भार्गव
शिक्षा - MA हिन्दी, B. ED., NET 8 बार JRF सहित
माता-पिता - श्रीमती गौरां देवी, श्री कालूराम भार्गव
प्रकशित रचनाएं -
जलियांवाला बाग दीर्घ कविता (खंड काव्य )
मैं हिन्दी हूँ - राष्ट्रभाषा को समर्पित महाकाव्य (महाकाव्य )
आकाशवाणी वार्ता - सिटी कॉटन चेनल सूरतगढ राजस्थान भारत
कविता संग्रह शीघ्र प्रकाश्य -
यह मेरे पंजाब की धरती (महाकाव्य )
तुम क्यों मौन हो - ( खंड काव्य )
पत्र - पत्रिकाएँ - शोध जर्नल
स्त्रीकाल - (यूजीसी लिस्टेड शोध पत्रिका) आजीवन सदस्यता I
अक़्सर - (यूजीसी लिस्टेड शोध पत्रिका) आजीवन सदस्यता I
अन्य भाषा, गवेषणा, इन्द्रप्रस्थ भारती, मधुमती का नियमित पठन I
समाचार पत्र - प्रभात केशरी (राजस्थान का प्रसिद्ध सप्ताहिक समाचार पत्र) में समय समय पर विभिन्न विमर्श पर लेखन I
उद्देश्य- हिंदी को प्रशासनिक स्तर पर कार्यालयी लोकप्रिय भाषा बनाना।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
hindijudwaan@gmail.com